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लेखनी कहानी -14-Jan-2023

*डेनिस डाइडेरोट प्रभाव*
                (Denis Diderot Effect)


मन के दर्शन में भौतिकवाद का एक रूप होता है।
अत्यधिक भौतिकवादी लोग मानते हैं कि जीवन के महत्वपूर्ण लक्ष्यों; जैसे खुशी, सफलता और वांछनीयता को प्राप्त करने के लिए चीजों का स्वामित्व और खरीदारी आवश्यक साधन हैं।  हालांकि, अधिक स्वामित्व की अपनी चाहत में, वे अक्सर अन्य महत्वपूर्ण लक्ष्यों को दरकिनार कर देते हैं।

फ्रांस में जन्में विज्ञान और पश्चिमी दर्शनशास्त्र के जानेमाने लेखक डेनिस डाइडेरोट एक विद्वान पाठक थे। सन 1765 में उनकी आयु लगभग 52 वर्ष थी।  उन्होंने कई किताबें पढ़ी थीं। उनका अपना एक बड़ा पुस्तकालय भी था। अनेक अलग अलग विषयों पर लिखी पुस्तकें पढ़ने में ही उनका पूरा जीवन बीत गया था। लेकिन उन्हें गरीबी भी बहुत सहनी पड़ी थी।  वह इतना गरीब थे कि उनके पास लड़की की शादी के लिए भी पैसे नहीं थे।

उस समय रूस की रानी कैथरीन को डेनिस डाइडेरॉट की विद्वत्ता और गरीबी दोनों के बारे में पता चला।
उन्होंने डाइडरॉट को मदद करने के उद्देश से पैसे के बदले में उनकी लाइब्ररी खरीदने के लिए उन्हें एक सुझाव दिया।
डाइडरोट को उस वक्त के (1000 जीबीपी) 50 हजार डॉलर मतलब आज के हिसाब से लगभग चार करोड़ ( 3.9 cr) रुपयों की पेशकश की। डेनिस डाइडरॉट ने सहमति व्यक्त की और अपनी प्रिय लाइब्ररी रानी कैथरीन को बेच दी।

डेनिस डाइडरोट एक दिन में बहुत अमीर हो गए।

उस पैसे से उन्होंने तुरंत 'स्कार्लेट रॉब' यानी उस समय की अच्छी क्वालिटी की और महंगी ड्रेस खरीदी। महंगे कपड़े खरीदने के पश्चात, इस तरह पैसोका उपयोग करते हुए उन्होंने महसूस किया कि वो उच्च गुणवत्तावाले कपड़े तो पहन रहे है, लेकिन उनके घर में उनके कपडोंसे मेल खाती ढंग की, उच्च गुणवत्तावाली वस्तुएँ नहीं हैं।  और तो और उन्हें रखने के लिए अच्छा सा घर भी नहीं है।

फिर उन्होंने धीरे-धीरे घर की चीजें बदल दीं। घर बदल दिया।  किचन का सामान बदला।  फर्नीचर बदला गया।  सब कुछ एकदम नया खरीद लिया।  अब उनका पूरा का पूरा घर और उनके कपड़े सबकुछ खूबसूरत लग रहे थे।  लेकिन यह सब करते करते सारे पैसे खर्च हो गए और वह फिर से गरीब हो गये। और रोजमर्रा की जिदंगी जीने के लिए उन्हें फिर से कर्ज लेना पड़ा।

डेनिस डाइडरोट ने इस घटना को बड़े दुख के साथ सहा और बाद में इन सभी अनुभवों को अपने एक निबंध में लिखा। जिसे आज भी लोग पढ़ते है।
इसे मनोविज्ञान में डाइडरॉट प्रभाव (Diderot Effect) कहते हैं।

बड़े उद्यमी, व्यवसायी, व्यापारी, विकासकर्ता, नेता भी इस प्रभाव से जाने अंजाने में शिकार हो जाते है।
मगर इस प्रभाव के पालन से छुटकारा पाना हमारे लिए कोई समस्या नहीं है।  कैसे...? देखते है।

मान लीजिए हमने एक महंगी कार खरीदी।  फिर हम उसको मैचिंग अपहोस्ट्री खरीदते हैं। कार की स्टैंडर्ड के हिसाब से हमारी घड़ी, मोबाइल, जूते, गॉगल्स आदि लेते हैं।  
घर में बड़ासा टीवी लेते है। उसे रखने के लिए वॉल यूनिट या कोई ढंग का फर्नीचर लेते है। एचडी चैनल्स भी साथ में शुरू हो जाते है। 
एक बार घर को नए रंग से रंग दिया जाए तो उसे मैचिंग पर्दों से सजाया जाता है।

और भी कुछ उदाहरण है। ...
मान लीजिए हमने एक लाख का लैपटॉप खरीदा। फिर एक लाख का मोबाइल खरीदा। फिर हमें लगता है कि सादा सा हेड फोन इस पर काम नहीं करेगा, तो महंगेसे महंगे वायरलेस  हेडफोन खरीदें।  क्योंकि यह मोबाइल सस्ता नहीं है।

अब सोचो। हम यह सब किस लिए करते है?
खुद की खुशियोंके लिए?
या दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने के लिए?...
कारण कुछ भी हो सकता है।  मगर परिणाम?
बस... इसे ही  कहते हैं 'डाइडरॉट इफेक्ट'।

तो डाइडरोट इफेक्ट को अगर संक्षेप में कहां जाये तो 
जब कोई नई वस्तु खरीदी जाती है; तो वह अपनेआप ही ,  रूप से किसी अन्य वस्तु की गुणवत्ता को कम कर देती है  और हम इसे पाने के लिए ज्यादा से ज्यादा खर्च करते हैं।

जब हम कोई वस्तु खरीदने जाते हैं तो अपनेआप अन्य चीजें खरिदी जाती है।  हालांकि प्राथमिक जरूरतें पूरी करने के लिए, जीवन जीने के लिए यह सिलसिला अत्यावश्यक नहीं होता है।
इस तरह हम एक बार में एक चीज लेकर फिर उसके पीछे बहुत सी अनावश्यक चीजें खरीदते है। या तो वह चीजें;  जो बहुत जरूरी नहीं  हैं उन्हें खरिदते रहते हैं। यह मानव की सामान्य प्रवृत्ति है।
इसे शास्त्रीय भाषा में 'स्पाइरलिंग कंझम्प्शन' (spiralling consumption) भी कहते हैं।

किसी एक चीज की जरूरत महसूस करना और उसे खरीदना;  यह 'डाइडेरोट इफेक्ट' (Diderot effect) है। "स्पाइरलिंग कंझम्प्शन" और "डाइडेरोट इफेक्ट" यह दोनों संकल्पनाएं एकदूसरे से प्रभावित लगती है।

यह बात सच है की मानव की इस प्रवृत्ति के परिणाम भयानक होते हैं। लेकिन वे हमें खुली आंखों से भी दिखाई नहीं देते हैं।  हम अनजाने में ही बेवजह खर्च कर देते हैं। कम ही लोग इसे नोटिस करते हैं और इस पर काबू पाना भी उन्हें आता है।  कुछ लोगों को इसका एहसास बहुत देर से होता है। लेकिन बहुत से लोगों को इसका बिल्कुल भी एहसास नहीं होता है।  इसलिए वे इस प्रभाव से बच नहीं सकते। और अनावश्यक खर्च करते रहते हैं। 
डेनिस डाइडेरोट विद्वान होने के बावजुद इस प्रवृत्ति पर स्वयं को अंकुश नहीं लगा सके थे।

वैसे तो अक्सर आम आदमी भी व्यय करने से नहीं डरते है। अपनी अपनी  जरूरतों के मुताबिक और अपनी अपनी हैसियत के मुताबिक इन्सान खर्चे करता ही है।  हरकिसीकी "स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग" की परिभाषा उनकी आमदनी और विचारों की पैदाइश होती है।

फिर भी आम तौरपर कुछ भी खरीदते समय...  मुझे इस वस्तु की कितनी आवश्यकता है? यह प्रश्न स्वयं से पूछें।  इसके बारे में सोचने के बाद यदि उत्तर "हाँ" है तो आपको उस वस्तु को खरीदने का निर्णय लेना चाहिए।
ऐसा निर्णय लेने के बाद, क्या वस्तु की गुणवत्ता और कीमत उचित है?  इसके बारे में सोचें और इसे उस कीमत के बजाय उचित मूल्य पर खरीदने का प्रयास करें जो आपको मिल सकती है।

दुकानदार एक वस्तु आपके सामने रखता है।  वह तुरंत आपको दूसरी वस्तु दिखाकर भ्रम पैदा करता है।  तब एक बात का ध्यान रखना चाहिए;  वस्तु कितनी भी अच्छी क्यों न हो, लेकिन इसका हमारी उपयोगिता और खुशी से कोई लेना-देना नहीं है तो वह सुख क्षणिक है।  समय के साथ, ऐसी खुशी खत्म हो जाती है और पैसा चला जाता है और बाद में पछतावा होता है।  इसलिए इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की जरूरत है।  लेकिन ऐसा करते समय आपको इसे स्वयं आजमाना होगा।
क्योंकि भौतिकवाद से हमारी मानवीय संवेदनाएं घटती है।

समय के साथ बदलते भौतिक परिवेश और जीवन प्रतिस्पर्धा में आर्थिक परेशानी के कारण संयुक्त परिवार बिखरकर एकल बन गए जिससे परिवार की संस्कार पाठशालाएं बंद हो गयीं। नैतिक मूल्यों के पतन में समाज से अधिक भूमिका अभिभावक की है क्यूंकि इन्ही परिवारों से समाज का निर्माण होता है।
इसलिए अगर भौतिकवाद से बचना है तो डाइडेरोट इफेक्ट से बचें

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4 Comments

बहुत ही खूबसूरत लेख,,, बहुत ही बारीकी से आपने भाव व्यक्त किए हैं

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बेहतरीन

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बहुत खूब

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